Wednesday, November 3, 2010

सितम की इंतहा क्या है?

शहीद भगत सिंह कि एक कविता मुझे अचानक कही मिली है . फिर मन में आया कि क्या इसे अपने ब्लॉग में देना सही होगा . पर उस वीर कि आजादी के जज्बे ने मुझ डरपोक में भी ये साहस जगा दिया कि ये कविता सब के लिए है. उस मानुष कि आवाज जो अंग्रेजो को थर्रा सकती थी में आज भी दम है . आज भी जरूरत है इस देश के सोये जवानों को जगाने की . मुझे यह सही सही पता भी नहीं कि ये कविता उन्ही कि है या  नहीं . पर पहली चार पंक्तियों से ही अप मन जायेंगे कि ये उन्ही कि कविता है
उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?
दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।
 
है ना कुछ बात दोस्तों .  मेरे ब्लॉग के इस प्रविस्ठी का नाम मैंने इसी कविता कि एक लाइन पे रखा है . इस सितम कि इन्तहा क्या है . वाकई इस एक लाइन से ही उस शहीद के जज्बे को सलाम करने का बारम्बार मन होता है . ये चुनौती थी पूरी अंग्रेजी सल्तनत को कि बता तेरे सितम कि इन्तहा क्या है . आ देखे तेरे बाजुओ में दम कितना है .

त्यौहार

अब नई नई बाते सुनता हु मैं
पिछली होली में सुना था कि अब से रंग नहीं खेलना है
अब अबीर होली खेलेंगे
जो बूढ़े अब पानी से नहा नहीं सकते
वो देश को सिखा रहे है कि रंग नहीं खेलना है
तर्क उनका है कि पानी बर्बाद ना करो
अपनी नामर्दी के साये में वे बच्चो से उनकी होली छीन रहे है
जो अपने गमले को सींचने के लिए रोज पानी बर्बाद करते है
वो बच्चो कि एक दिन कि होली को बंद करना चाहते है
अब एक नया नारा है
इको फ्रेंडली दिवाली मनाना है
फटाके नहीं फोड़ने है 
देश में पॉवर प्लांट चलने वाले बच्चो को बता रहे है
कि फटाके से प्रदूषण होता है
राज्योत्सव में दस मिनट में एक हजार किलो बारूद जलाने वाले
कहते है फटाके ना जलाओ
हाँ ये अभियान है एक हमारे संस्कारो को बदलने का
जम के फोड़ो फटाके , जम के खेलो रंग
हमारे है त्यौहार
मनाएंगे हम इन्हें अपने ही ढंग
बूढ़े जो मरने के करीब है , अपनी मौत का इंतज़ार करे
या आये हमारे साथ जवान होने
खेले रंग जम के और छुपा ले अपनी झुर्रियो को
कुछ दिनों के लिए
या कही और जाये अपने कैम्पेन को चलाने के लिए
और भी त्यौहार है दुनिया में
और भी रिवाज है दुनिया में
बदलने के लिए

अंत

कही जाके हर रास्ते ख़त्म हो जाते है
कही जीवन की हर वजह ख़त्म हो जाती है
तेरा क्या है मेरा क्या है
ये दुनिया ही किसी और की हो जाती है
फकत एक पात्र हूँ मैं भी रंगमंच का
तेरी तरह ही मेरे भी संवाद खत्म हो जाते है
कब तक जिए और किसलिए जिए हम
शायद अपने हिस्से की हर बात जी चुके हम
अंतहीन सपने अब भी बरक़रार है
उसी तरह जिस तरह बचपन में थे
पर अब शायद इशारा होने लगा है
सफ़र अब शायद ख़त्म होने लगा है
एक दिन इस वजूद का भी अंत होना है
सच के दामन में दफ़न होना है

Tuesday, November 2, 2010

दुनिया में जो चाहो वो नहीं मिलता
प्यार चाहो प्यार नहीं मिलता
धन चाहो धन नहीं मिलता
पद चाहो पद नहीं मिलता
हद तो तब है जब गम चाहो गम नहीं मिलता
कभी मौत चाहो तो मौत नहीं मिलता

Saturday, October 9, 2010

अब ना कहूँगा

अब ना कहूँगा
प्यार की   बाते
अब ना कहूँगा
हंसी की बाते
अब ना कहूँगा
ख़ुशी कीबाते
अब ना कहूँगा
गर्व की बाते
अब ना कहूँगा
जलन की बाते
अब ना कहूँगा
फर्ज की बाते
अब ना कहूँगा
कर्त्तव्य की बाते
अब ना कहूँगा
क्रोध की बाते
बातो का अब कोई मतलब नहीं
चुप रहना सीख रहा हूँ
दुनिया में रहना सीख रहा हूँ

Monday, October 4, 2010

सब कुछ अच्छा ही हुआ

सरकारी नौकरी में कभी कभी डर भी लगता है. ३० तारिख को वाकई एक ऐसा दिन था जब हर कोई सोच में पड़ा था कि क्या होगा . लेकिन एक सकारात्मक बात थी कि हर किसी को सिर्फ फैसले का इन्तजार था . कोई दावा नहीं कर रहा था कि यह फैसला होगा . लोगो को किस तरह पलटना आता है यह भी दिखाई दिया . कई लोग २४ के फैसले को जुम्मे में मुस्लिम के तरफ होना बता रहे थे वही ३० को गुरुवार होने से हिन्दुओ कि ओर जाने कि बात करने लगे . आखिर फैसला आ ही गया और all is well  ही रहा . भारत के लोकतंत्र ने दुनिया को दिखा दिया कि यहाँ जज्बातों से भी महत्व पूर्ण मुद्दे होते है . एक कोर्ट के निर्णय से पूरा भारत हिल जाये  अब वो हालत नहीं रहे . वाकई भारत एक सुपर पॉवर बन रहा है. राष्ट्र मंडल खेल भारत में होने है और पुरे विश्व ने जान लिया कि ये देश अब हिंसा के खेल के लिए नहीं सच्चे खेलो के लिए तय्यारी कर रहा है . खेलो में भी अब भारत तेजी से तर्रक्की कर रहा है . लोग ये देख रहे है कि ये देश सिर्फ सपेरो का देश नहीं रहा है . इस देश से अब अमेरिका भी घबराता है .

Wednesday, September 29, 2010

सब कुछ अच्छा होगा

आज फिर दिन भर अटकलों का दौर जरी रहा . कौफी हाउस से लेकर तहसील ऑफिस के गलियारों तक सब अपनी अपनी दलील दे रहे है की जज किसकी तरफ फैसला करेंगे . एक सबसे अलग बात सुनाई दी की शायद ये हो सकता है की तीन जजों की बेंच के दो हिन्दू जज मुसलमानों के तरफ फैसला दे और मुस्लिम जज हिन्दुओ की तरफ अपनी राय दे. कही ऐसा न हो जाये की मुस्लिमो के पक्छ में २-१ से निर्णय आ जाये. अब अटकलों का ही दौर है . वाकई ऐसा लगता है की सबसे बड़ा फैसला आना है . यह भी अपनी अपनी किस्मत  होती है कि किसको क्या काम  मिलता है .  एक ही चट्टान का एक टुकड़ा मूर्ति के रूप में भगवान बनता है दूसरा मंदिर कि सीढ़ी में लगता है जिसमे सब पैर रखते है . यही जजों के साथ होता है . अधिकांश जज जेबकतरों को सजा देने में ही जीवन बिता देते है . जबकि इन तीन जजों कि किस्मत में राम लला के जन्मस्थान का निर्धारण नियत है . आज कि रात तीनो शायद सो नहीं पाएंगे . कल उनके निर्णय के बाद कही हजारो फौजदारी मुक़दमे देश  भर में दर्ज न हो जाये ये चिंता उन्हें जरूर होगी . बहुत से लोगो का ये भी मानना है कि शायद फैसला ये हो कि दोनों को वंचित करते हुए सरकार को जमीन दे दी जाये. लेकिन जो भी हो कल सब कुछ अंतिम नहीं होगा . भारत कि न्याय प्रणाली में सच्चाई कि जीत होती जरूर है पर अगर कोई फैसले को अंतिम न होने देना चाहे तो उसके पास कई रास्ते मौजूद है . लेकिन एक बात है कि मुझे कही आम जनता से  कोई भी ऐसा उद्ग़ार सुनने को नहीं मिला कि फैसला यह होना चाहिए . हर कोई ये बता रहा है कि ये फैसला आ सकता है पर कोई यह नहीं कह रहा है कि यही फैसला आना चाहिए . या ये नहीं कह रहा है कि यह फैसला नहीं आने पर वह यह काम करेगा . सबको पता है कि भारत को लोक तंत्र बहुत मजबूत है . फिर १९८४ और १९९२ कि चोट लोग भूले नहीं है . पिछले २ वर्षो से गुजरात दंगो में चल रही कार्यवाहियों ने भी सबको काफी कुछ सिखाया है . सरकारी कर्मचारी तो किसी पक्छ में जाने कि बात शायद सोच भी नहीं सकते . कुल मिलकर मुझे तो यही लगता है कि all is well ही रहना है . मेरी तो यही दुआ है  आह्वान है सभी से कि संयम बनाये रखे . इस दिशा में सोचे कि वहा अकबरी राम स्कूल बनवाना है .